Sunday, September 13, 2026

 दुनिया की नज़रें इस वक्त भारत की राजधानी नई दिल्ली पर टिकी हैं। बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) की नींव को और मजबूत करने के उद्देश्य से BRICS शिखर सम्मेलन 2026 का आयोजन दिल्ली में किया जा रहा है। 2024 में हुए एतिहासिक विस्तार—जिसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) शामिल हुए थे—के बाद, यह विस्तृत 'BRICS+' का एक बेहद महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन माना जा रहा है।

ग्लोबल साउथ (Global South) की मजबूत आवाज बनकर उभरा यह संगठन केवल आर्थिक रणनीतियों पर चर्चा नहीं कर रहा, बल्कि पश्चिमी देशों के एकाधिकार को चुनौती देते हुए व्यापार, तकनीक और सुरक्षा के क्षेत्र में एक नया ब्लूप्रिंट तैयार कर रहा है।

दिल्ली शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा

इस बार दिल्ली में आयोजित हो रहे इस ऐतिहासिक सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े कई दूरगामी फैसले लिए जा रहे हैं।

1. लोकल करेंसी में व्यापार और डी-डॉलरलाइजेशन (De-Dollarization)

अमेरिकी डॉलर ($) पर वैश्विक निर्भरता को कम करना BRICS का सबसे प्रमुख उद्देश्य रहा है।

[caption id="attachment_723" align="alignnone" width="691"] De-Dollarization[/caption]
  • स्थानीय मुद्राओं का उपयोग: भारत के UPI और RuPay जैसे डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर के सफल मॉडल को ध्यान में रखते हुए, सदस्य देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं (रुपया, युआन, रियाल आदि) में आपसी व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं।

  • BRICS Pay: एक सीमा पार (Cross-Border) डिजिटल भुगतान प्रणाली 'BRICS Pay' को और मजबूत करने पर सहमति जताई जा रही है, जिससे SWIFT नेटवर्क पर निर्भरता काफी हद तक कम हो सके।

2. न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) का दायरा और विस्तार

 

शंघाई स्थित New Development Bank (NDB) को पश्चिमी देशों के IMF और वर्ल्ड बैंक के एक मजबूत और निष्पक्ष विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है।

[caption id="attachment_724" align="alignnone" width="723"] BRICS De-Dollarization in Delhi Summit[/caption]
  • दिल्ली सम्मेलन में विकासशील और गरीब देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली, पानी और डिजिटल नेटवर्क के विकास के लिए अरबों डॉलर के नए फंड को मंजूरी दी जा रही है।

  • NDB की खासियत यह है कि यह किसी देश को लोन देते समय उसकी राजनीतिक या घरेलू नीतियों में दखल देने की कठोर शर्तें नहीं थोपता।

3. ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई चेन

सऊदी अरब, UAE, ईरान और रूस जैसे दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस उत्पादक देश अब BRICS का हिस्सा हैं। वहीं भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता हैं।

  • स्थिरता और व्यापार: दिल्ली सम्मेलन के दौरान कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सीधी और सुरक्षित आपूर्ति के लिए नए समझौतों पर हस्ताक्षर हो रहे हैं।

  • रिन्यूएबल एनर्जी: पारंपरिक ऊर्जा के साथ-साथ सोलर पैनल, ग्रीन हाइड्रोजन और विंड एनर्जी के क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान (Joint Research) पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

4. टेक्नोलॉजी, AI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI)

[caption id="attachment_725" align="alignnone" width="638"] BRICS De-Dollarization in Delhi Summit[/caption]

भारत ने अपने 'डिजिटल इंडिया' और 'DPI' (डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर) मॉडल से पूरी दुनिया को प्रभावित किया है।

  • सम्मेलन में भारत अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुभव को अन्य BRICS देशों के साथ साझा कर रहा है।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): AI के सुरक्षित, निष्पक्ष और पारदर्शी उपयोग के लिए साझा नियम और गाइडलाइंस तैयार की जा रही हैं, ताकि AI की शक्ति पर कुछ ही पश्चिमी टेक कंपनियों का एकाधिकार न रहे।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में BRICS की ताकत

2024 के विस्तार के बाद BRICS अब एक विशाल आर्थिक और जनसांख्यिकीय महाशक्ति बन चुका है:

मापदंडBRICS की वैश्विक हिस्सेदारी
वैश्विक आबादीदुनिया की लगभग 45% आबादी
जीडीपी (PPP आधार पर)वैश्विक जीडीपी में 35% से अधिक हिस्सेदारी (G7 से काफी आगे)
कच्चा तेल (Crude Oil)दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग 43% हिस्सा
वैश्विक व्यापारकुल वैश्विक व्यापार का 25% से अधिक

भारत के लिए दिल्ली सम्मेलन का महत्व

दिल्ली में इस सम्मेलन का आयोजन भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है:

  1. ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में स्थापना: भारत विकासशील देशों की प्राथमिकताओं, जैसे कि कर्ज राहत, जलवायु वित्त (Climate Finance) और खाद्य सुरक्षा को प्रमुखता से सामने रख रहा है।

  2. रणनीतिक संतुलन (Strategic Autonomy): भारत एक तरफ पश्चिमी देशों (G7, Quad) के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखता है, वहीं दूसरी तरफ BRICS के माध्यम से रूस, चीन और मध्य पूर्व के देशों के साथ अपना संतुलन साधता है।

  3. चीन के साथ बहुपक्षीय मंच पर जुड़ाव: दोतरफा तनावों के बावजूद, BRICS भारत और चीन को आर्थिक मुद्दों पर साथ बैठकर बात करने का एक व्यावहारिक मंच प्रदान करता है।

BRICS के सामने मुख्य चुनौतियां

इतने बड़े स्तर पर सफलता के बावजूद BRICS के सामने कुछ अंदरूनी और बाहरी चुनौतियां भी मौजूद हैं:

  • साझा करेंसी पर मतभेद: पूरी तरह से एक नई 'BRICS करेंसी' बनाना काफी जटिल है, क्योंकि सभी 10 सदस्य देशों की आर्थिक नीतियां, मुद्रास्फीति (Inflation) दरें और नीतियां अलग हैं। इसलिए ध्यान नई मुद्रा बनाने के बजाय स्थानीय मुद्राओं के उपयोग पर ज्यादा है।

  • आंतरिक भू-राजनीतिक खिंचाव: भारत और चीन के सीमाई मुद्दे, या मध्य पूर्व के देशों के आपस में ऐतिहासिक समीकरण कभी-कभी साझा फैसलों में समय लगाते हैं।

  • पश्चिमी देशों की नजरें: अमेरिका और यूरोपीय देश BRICS के इस विस्तार को अपनी आर्थिक व्यवस्था के लिए एक चुनौती के रूप में देखते हैं।

नई दिल्ली में चल रहा यह BRICS सम्मेलन केवल बैठकों और बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था का जीवंत उदाहरण है। यह सम्मेलन साबित करता है कि आने वाला समय बहुध्रुवीय (Multipolar) दुनिया का है, जहाँ आर्थिक और राजनीतिक फैसले केवल कुछ पश्चिमी राजधानियों में तय नहीं होंगे, बल्कि नई दिल्ली, बीजिंग, ब्रासीलिया और मॉस्को जैसे मंचों से संचालित होंगे।

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