Monday, August 24, 2026

पाताल भुवनेश्वर: धरती के नीचे बसा रहस्यमयी शिवलोक, इतिहास, मान्यताएं और पूरी यात्रा गाइड



उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, लेकिन इस देवभूमि में कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहाँ पहुंचकर ऐसा महसूस होता है मानो हम धरती की सतह से निकलकर किसी दूसरी ही दुनिया में प्रवेश कर गए हों। पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर ऐसा ही एक अद्भुत धार्मिक और प्राकृतिक स्थल है।

यह कोई साधारण मंदिर नहीं है। यहां श्रद्धालुओं को पहाड़ के भीतर बनी एक गहरी प्राकृतिक गुफा में उतरना पड़ता है। गुफा के अंदर चूना-पत्थर से हजारों वर्षों में बनी प्राकृतिक आकृतियां दिखाई देती हैं। इन्हीं आकृतियों को लेकर भगवान शिव, गणेश, शेषनाग, चार धाम और अनेक देवी-देवताओं से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं।

अंधेरी गुफा, संकरे रास्ते, टपकता पानी और चट्टानों की अनोखी बनावट—पाताल भुवनेश्वर को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था और प्रकृति के अद्भुत संगम के रूप में खास बनाते हैं।

नोट: इस लेख में इतिहास और भौगोलिक तथ्यों को पौराणिक एवं स्थानीय मान्यताओं से अलग समझना जरूरी है। गुफा के भीतर दिखाई देने वाली कई आकृतियां प्राकृतिक भूवैज्ञानिक संरचनाएं हैं, जबकि उनसे जुड़े देवी-देवताओं के स्वरूप धार्मिक आस्था और परंपराओं का हिस्सा हैं।

पाताल भुवनेश्वर कहाँ स्थित है?

पाताल भुवनेश्वर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक प्रसिद्ध गुफा मंदिर है। यह गंगोलीहाट से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर है और समुद्र तल से लगभग 1,350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बताया जाता है। सरकारी जिला वेबसाइट के अनुसार यह एक प्राकृतिक गुफा मंदिर है, जिसमें संकरी सुरंगनुमा राह से प्रवेश किया जाता है।

यह स्थान कुमाऊं क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में शामिल है। पिथौरागढ़, गंगोलीहाट, चौकोरी और बेरीनाग की यात्रा के साथ इसे जोड़ा जा सकता है।

पाताल भुवनेश्वर नाम का अर्थ क्या है?

नाम को दो भागों में समझा जा सकता है—

  • पाताल — धरती के नीचे या गहराई से जुड़ा स्थान
  • भुवनेश्वर — भगवान शिव का एक नाम

इस प्रकार पाताल भुवनेश्वर का अर्थ लगभग धरती की गहराई में स्थित भगवान शिव का पवित्र स्थान माना जाता है।

यही कारण है कि जब श्रद्धालु संकरी गुफा से नीचे उतरते हैं, तो यह अनुभव सामान्य मंदिर दर्शन से बिल्कुल अलग होता है।


गुफा के अंदर प्रवेश का अनुभव कैसा है?

पाताल भुवनेश्वर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको एक प्राकृतिक गुफा के भीतर उतरना पड़ता है।

सरकारी कुमाऊं मंडल की जानकारी के अनुसार गुफा के गर्भगृह तक पहुंचने के लिए लगभग 82 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं और प्रवेश का रास्ता संकरा है। अंदर सुरक्षा के लिए लोहे की जंजीरों का सहारा लेना पड़ सकता है।

जैसे-जैसे आप नीचे उतरते हैं, बाहर की दुनिया पीछे छूटने लगती है।

पहाड़ों की खुली हवा की जगह ठंडी और नम गुफा का वातावरण महसूस होने लगता है। रोशनी सीमित होती है और चारों ओर चट्टानों की विचित्र संरचनाएं दिखाई देती हैं।

यहीं से पाताल भुवनेश्वर का असली अनुभव शुरू होता है।


आखिर यह गुफा बनी कैसे?

पाताल भुवनेश्वर केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी दिलचस्प है।

यह एक चूना-पत्थर यानी Limestone Cave है। लंबे समय तक पानी और प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाओं के कारण चूना-पत्थर धीरे-धीरे घुलता और दोबारा जमता रहता है। इसी प्रक्रिया से गुफाओं के अंदर अलग-अलग आकार बनते हैं।

इनमें मुख्य रूप से दो प्रकार की संरचनाएं बन सकती हैं:

1. स्टैलेक्टाइट (Stalactite)

ये संरचनाएं गुफा की छत से नीचे की ओर बनती हैं।

2. स्टैलेग्माइट (Stalagmite)

ये संरचनाएं जमीन से ऊपर की ओर विकसित होती हैं।

हजारों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया से बनी ऐसी संरचनाएं कभी किसी शिवलिंग जैसी दिखाई देती हैं, कभी किसी आकृति जैसी और कभी किसी जीव के रूप जैसी।

यही प्राकृतिक संरचनाएं पाताल भुवनेश्वर को इतना अद्भुत बनाती हैं।

सरकारी जानकारी में भी गुफा के भीतर चूना-पत्थर की संरचनाओं में गणेश, शेषनाग, गरुड़ और शिवलिंग जैसे स्वरूप दिखाई देने का उल्लेख है।


पाताल भुवनेश्वर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक मान्यताएं

अब आते हैं इस गुफा के सबसे रोचक हिस्से पर।

पाताल भुवनेश्वर से अनेक पौराणिक कथाएं और स्थानीय मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

1. 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास

लोकमान्यता है कि इस पवित्र गुफा में 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास है।

यहां एक बात समझना जरूरी है कि “कोटि” शब्द को अक्सर सीधे 33 करोड़ के अर्थ में लिया जाता है, जबकि धार्मिक और भाषाई व्याख्याओं में इसके अन्य अर्थों पर भी चर्चा होती है। इसलिए इसे श्रद्धा और परंपरा के संदर्भ में समझना अधिक उचित है।

फिर भी स्थानीय आस्था में पाताल भुवनेश्वर को अनेक देवी-देवताओं के निवास स्थान के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है।


2. राजा ऋतुपर्ण द्वारा गुफा की खोज की मान्यता

कुमाऊं मंडल की सरकारी जानकारी के अनुसार धार्मिक मान्यता है कि सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण ने त्रेता युग में इस गुफा की खोज की थी।

इसी परंपरा में गुफा का उल्लेख स्कंद पुराण के मानस खंड से भी जोड़ा जाता है। यह धार्मिक परंपरा और मान्यता का हिस्सा है।


3. आदि शंकराचार्य और पाताल भुवनेश्वर

एक प्रचलित धार्मिक परंपरा के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य ने भी इस गुफा का दर्शन किया था और उनके बाद आधुनिक काल में इस स्थान की तीर्थ पहचान को नया महत्व मिला।

यह कथा भी पाताल भुवनेश्वर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


गुफा के अंदर क्या-क्या देखने को मिलता है?

पाताल भुवनेश्वर की खासियत यह है कि यहां श्रद्धा और प्राकृतिक भूविज्ञान एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

गुफा के अंदर दिखाई देने वाली प्रमुख प्राकृतिक संरचनाओं को स्थानीय परंपराओं में अलग-अलग देवी-देवताओं से जोड़ा जाता है।

इनमें प्रमुख हैं:

  • भगवान शिव से जुड़ी प्राकृतिक संरचनाएं
  • गणेश का स्वरूप
  • शेषनाग जैसी चट्टानी आकृति
  • गरुड़ से जोड़ी जाने वाली संरचना
  • शिव की जटाओं जैसी दिखाई देने वाली स्टैलेक्टाइट संरचनाएं
  • प्राकृतिक जल की बूंदों से लगातार बदलती चट्टानी बनावट

कई श्रद्धालु इन आकृतियों को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि प्रकृति ने बिना किसी मानव कलाकार के इतनी जटिल संरचनाएं कैसे बनाई होंगी।


प्राकृतिक शिवलिंग और लगातार टपकता जल

पाताल भुवनेश्वर की धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भगवान शिव से जुड़ी प्राकृतिक संरचनाएं हैं।

उत्तराखंड पर्यटन विभाग की जानकारी के अनुसार गुफा के अंदर स्थित शिवलिंग पर प्राकृतिक जलधारा द्वारा लगातार जलाभिषेक होने की मान्यता और विशेषता बताई गई है।

श्रद्धालुओं के लिए यह दृश्य केवल प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं बल्कि भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति का अनुभव है।


शेषनाग की रहस्यमयी आकृति

गुफा के अंदर दिखाई देने वाली सबसे चर्चित प्राकृतिक संरचनाओं में से एक को शेषनाग के रूप में देखा जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार शेषनाग पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। पाताल भुवनेश्वर की चट्टानी संरचनाओं को इसी कथा से जोड़कर देखा जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से यह चूना-पत्थर से बनी प्राकृतिक संरचना है, लेकिन आस्था की दृष्टि से यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

यही पाताल भुवनेश्वर की सबसे खास बात है—

एक ही चट्टान को कोई भूवैज्ञानिक प्राकृतिक संरचना के रूप में देख सकता है और कोई श्रद्धालु उसी में अपने आराध्य का स्वरूप देख सकता है।


क्या पांडव भी पाताल भुवनेश्वर आए थे?

स्थानीय धार्मिक परंपरा में यह भी माना जाता है कि पांडवों ने अपनी अंतिम हिमालय यात्रा से पहले यहां भगवान शिव की आराधना की थी।

सरकारी कुमाऊं मंडल की जानकारी में भी इस मान्यता का उल्लेख मिलता है।

हालांकि इसे ऐतिहासिक प्रमाण के बजाय धार्मिक परंपरा और आस्था के रूप में ही समझना चाहिए।


पाताल भुवनेश्वर इतना रहस्यमयी क्यों लगता है?

इस स्थान के रहस्यमयी होने के पीछे कई कारण हैं।

पहला कारण — धरती के नीचे स्थित गुफा

अधिकांश मंदिर खुले स्थान पर बने होते हैं, लेकिन यहां दर्शन के लिए पहाड़ के भीतर उतरना पड़ता है।

दूसरा कारण — संकरे और अंधेरे रास्ते

गुफा में प्रवेश का अनुभव ही रोमांचक है।

तीसरा कारण — प्राकृतिक आकृतियां

चूना-पत्थर की संरचनाएं अलग-अलग जीवों और धार्मिक प्रतीकों जैसी दिखाई देती हैं।

चौथा कारण — हजारों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया

गुफा के अंदर बनने वाली संरचनाएं बहुत धीमी प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम हैं।

पांचवां कारण — पौराणिक कथाएं

शिव, शेषनाग, गणेश, पांडव और अनेक देवी-देवताओं से जुड़ी मान्यताएं इस स्थान को और रहस्यमयी बनाती हैं।


क्या पाताल भुवनेश्वर सिर्फ एक गुफा है?

नहीं।

सरकारी कुमाऊं मंडल वेबसाइट इसे केवल एक साधारण गुफा नहीं बल्कि “गुफाओं के भीतर गुफाओं” जैसा अनुभव बताती है। संकरी राहों और विभिन्न चट्टानी कक्षों के कारण यह स्थान एक भूमिगत संसार जैसा महसूस होता है।

इसी वजह से यहां आने वाले बहुत से लोग इसे केवल मंदिर दर्शन नहीं, बल्कि एक अलग अनुभव मानते हैं।


पाताल भुवनेश्वर कैसे पहुंचें?

सड़क मार्ग से

पाताल भुवनेश्वर तक पहुंचने के लिए आप उत्तराखंड के कई प्रमुख स्थानों से सड़क मार्ग का उपयोग कर सकते हैं।

मुख्य मार्गों में शामिल हैं:

हल्द्वानी / अल्मोड़ा → बागेश्वर क्षेत्र → चौकोरी / बेरीनाग क्षेत्र → गंगोलीहाट → पाताल भुवनेश्वर

या आपकी यात्रा के शुरुआती स्थान के अनुसार चंपावत और अन्य कुमाऊं मार्गों से भी पहुंचा जा सकता है।

सरकारी जिला वेबसाइट के अनुसार पाताल भुवनेश्वर गंगोलीहाट से लगभग 14 किलोमीटर दूर है।

ट्रेन से

यात्रा की योजना बनाते समय निकटतम सुविधाजनक रेलवे स्टेशन का चयन अपने शुरुआती शहर और सड़क मार्ग के अनुसार करें। सरकारी कुमाऊं मंडल वेबसाइट टनकपुर को एक नजदीकी रेल संपर्क के रूप में सूचीबद्ध करती है, जबकि पिथौरागढ़ जिला वेबसाइट काठगोदाम से दूरी की जानकारी भी देती है।

हवाई मार्ग से

नैनी सैनी हवाई अड्डा पिथौरागढ़ क्षेत्र के लिए एक निकट विकल्प है। सरकारी जिला वेबसाइट पाताल भुवनेश्वर की दूरी नैनी सैनी हवाई अड्डे से लगभग 90 किलोमीटर बताती है।


पाताल भुवनेश्वर जाने का सबसे अच्छा समय

सामान्य तौर पर यात्रा के लिए:

मार्च से जून

मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहता है और सड़क यात्रा आसान हो सकती है।

सितंबर के बाद से नवंबर

मानसून के बाद पहाड़ हरे-भरे होते हैं और मौसम आमतौर पर यात्रा के लिए अच्छा माना जाता है।

मानसून

बारिश के दौरान पहाड़ी सड़कों पर भूस्खलन और रास्ते बाधित होने की संभावना रहती है। इसलिए मौसम और सड़क की स्थिति पहले जांचना जरूरी है।

सर्दियों में

ठंड अधिक हो सकती है, लेकिन साफ मौसम मिलने पर यात्रा सुंदर अनुभव दे सकती है।

महत्वपूर्ण वर्तमान सूचना

यदि आप अभी यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो विशेष रूप से ताजा स्थिति जांचें। जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार कम ऑक्सीजन स्तर के कारण पाताल भुवनेश्वर गुफा को 11 अगस्त से 10 अक्टूबर 2026 तक आगंतुकों के लिए बंद रखने का निर्णय लिया गया था। यात्रा से पहले स्थानीय प्रशासन या मंदिर प्रबंधन से खुलने की स्थिति अवश्य पुष्टि करें।


पाताल भुवनेश्वर जाने से पहले ये जरूरी बातें जान लें

गुफा में प्रवेश सामान्य मंदिर की तरह आसान नहीं हो सकता। इसलिए:

  • आरामदायक और पकड़ वाले जूते पहनें।
  • सीढ़ियां और संकरे रास्ते होने के कारण सावधानी रखें।
  • बच्चों और बुजुर्गों को अतिरिक्त सावधानी की जरूरत हो सकती है।
  • यदि आपको सांस लेने, हृदय या अन्य गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो गुफा में प्रवेश से पहले स्थानीय अधिकारियों की सलाह लें।
  • गुफा के अंदर सुरक्षा नियमों का पालन करें।
  • चट्टानों या प्राकृतिक संरचनाओं को नुकसान न पहुंचाएं।
  • प्लास्टिक या कूड़ा गुफा में न छोड़ें।
  • यात्रा से पहले गुफा के खुले होने की वर्तमान स्थिति जांच लें।

2026 में कम ऑक्सीजन स्तर को लेकर सुरक्षा चेतावनियां और अस्थायी बंदी की खबर सामने आने के कारण यह सावधानी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।


पाताल भुवनेश्वर के आसपास और कहाँ घूमा जा सकता है?

अगर आप यहां तक पहुंच ही गए हैं, तो अपनी यात्रा को केवल एक मंदिर तक सीमित रखने की जरूरत नहीं है।

आप अपनी यात्रा योजना में आसपास के कुमाऊं क्षेत्र के ये स्थान शामिल कर सकते हैं:

गंगोलीहाट

प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाला क्षेत्र।

चौकोरी

हिमालयी चोटियों के शानदार दृश्य, चाय बागानों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध। उत्तराखंड पर्यटन इसे पाताल भुवनेश्वर से लगभग 40 किलोमीटर दूर बताता है।

बेरीनाग

कुमाऊं क्षेत्र का सुंदर पहाड़ी क्षेत्र, जहां से हिमालयी दृश्य और प्राकृतिक वातावरण यात्रा को खास बना सकते हैं।

जागेश्वर धाम

यदि आपके पास पर्याप्त समय है, तो प्राचीन मंदिरों के इस प्रसिद्ध समूह को भी यात्रा कार्यक्रम में शामिल किया जा सकता है।


पाताल भुवनेश्वर की यात्रा का एक सरल प्लान

अगर आप कुमाऊं की धार्मिक और प्राकृतिक यात्रा करना चाहते हैं, तो एक संभावित योजना इस प्रकार हो सकती है:

दिन 1: हल्द्वानी/काठगोदाम से अल्मोड़ा या आगे के पड़ाव की ओर यात्रा
दिन 2: चौकोरी या बेरीनाग क्षेत्र की यात्रा और रात्रि विश्राम
दिन 3: पाताल भुवनेश्वर दर्शन → गंगोलीहाट
दिन 4: आसपास के धार्मिक या प्राकृतिक स्थलों की यात्रा और वापसी

आपके शुरुआती शहर, वाहन और उपलब्ध समय के अनुसार इस रूट को बदला जा सकता है।


पाताल भुवनेश्वर के बारे में सबसे बड़ा सवाल: रहस्य या विज्ञान?

शायद पाताल भुवनेश्वर की असली खूबसूरती इसी सवाल में छिपी है।

विज्ञान कहता है कि गुफा की संरचनाएं चूना-पत्थर और प्राकृतिक भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का परिणाम हैं।

आस्था कहती है कि इन्हीं संरचनाओं में देवी-देवताओं का दिव्य स्वरूप दिखाई देता है।

दोनों दृष्टिकोण अपने-अपने स्थान पर मौजूद हैं।

लेकिन जब कोई व्यक्ति स्वयं गुफा के भीतर उतरता है, चट्टानों को देखता है, ठंडे वातावरण को महसूस करता है और हजारों वर्षों में बनी संरचनाओं के सामने खड़ा होता है, तो वह समझ सकता है कि यह स्थान सदियों से लोगों को क्यों आकर्षित करता रहा है।


पाताल भुवनेश्वर से जुड़ी रोचक बातें

  • यह पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक प्रसिद्ध प्राकृतिक गुफा मंदिर है।
  • यह गंगोलीहाट से लगभग 14 किलोमीटर दूर है।
  • गुफा चूना-पत्थर की प्राकृतिक संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध है।
  • अंदर पहुंचने के लिए संकरे मार्ग और नीचे उतरने वाली सीढ़ियों से गुजरना पड़ता है।
  • सरकारी कुमाऊं मंडल वेबसाइट के अनुसार लगभग 82 सीढ़ियां उतरकर गर्भगृह तक पहुंचा जाता है।
  • गुफा की प्राकृतिक संरचनाओं को गणेश, शेषनाग, गरुड़ और शिवलिंग जैसे धार्मिक स्वरूपों से जोड़ा जाता है।
  • स्कंद पुराण के मानस खंड से जुड़े धार्मिक उल्लेख की मान्यता प्रचलित है।
  • यह स्थान आस्था, भूविज्ञान और पर्यटन—तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

Tuesday, May 30, 2023

ध्रुव राठी विडियो पर विवाद ( केरला स्टोरी )

 केरला स्टोरी फिल्म और ध्रुव राठी के वीडियो पर विवाद के बारे में एक आर्टिकल यहां पेश किया जा रहा है:


केरला स्टोरी और ध्रुव राठी: वीडियो पर विवाद का नया मोड़


आधुनिक सामाजिक मीडिया के दौर में, आपने वीडियो बनाने और साझा करने का चलन देखा है। आपको केरला स्टोरी नामक फिल्म की भी जानकारी हो सकती है जिसने हाल ही में विवाद की चर्चा में रही है। वीडियो समीक्षक और कंटेंट क्रिएटर ध्रुव राठी द्वारा इस फिल्म के बारे में दिए गए एक वीडियो ने विवाद को और गहरा कर दिया है।


केरला स्टोरी फिल्म, जिसे केरल के एक प्रशिद्ध निर्माता-निर्देशक ने बनाया है, सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर आधारित है। इस फिल्म के माध्यम से, एक नागरिक समूह अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए संघर्ष करता है और समाज में बदलाव लाने की कोशिश करता है। फिल्म का उद्देश्य विचारशीलता बढ़ाना और जनता को सकारात्मक बदलाव के प्रति प्रेरित करना है।


ध्रुव राठी


, एक प्रमुख युट्यूबर और सामाजिक मीडिया प्रभावक, इस फिल्म के बारे में दिए गए वीडियो में इसे नकारा गया है। उन्होंने कहा है कि फिल्म की कथा में प्रश्नचिन्ह, विरोध और विभाजन का अधिक महत्व है, जो सामान्यतः उनके कंटेंट के साथ अनुचित रूप से जुड़ा हुआ है। ध्रुव राठी के मुताबिक, केरला स्टोरी फिल्म ने राजनीतिक एजेंडा प्रचलित किया है और इसे एक विचारशील फिल्म के रूप में दिखाया है, जबकि उनके मुताबिक फिल्म अधिक वाणिज्यिक है और उनके प्रशंसकों के लिए उपयोगी नहीं है।


ध्रुव राठी के वीडियो के बाद, वीडियो साझा करने वाले लोगों के बीच इस मुद्दे पर जोरदार विचार-विमर्श हुआ है। एक ओर, कुछ लोग ध्रुव राठी के विचारों से सहमत हैं और फिल्म की प्रशंसा करते हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ लोग इसे खुदरा कहते हैं और केरला स्टोरी की समर्थन करते हैं। इस तरह का विवाद वीडियो क्रिएटर और फिल्ममेकरों के बीच आम ब


ात है, जहां संवाद, विचार-विमर्श और अभिव्यक्ति की आज़ादी का महत्व होता है।


इस विवाद के बावजूद, यह उच्चस्तरीय चर्चा एक बदलाव की दिशा में लोगों को सोचने पर मजबूर करती है। केरला स्टोरी फिल्म और ध्रुव राठी के वीडियो दोनों अपनी अपनी दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करते हैं, जिससे विचारों की मान्यता और समान्यता पर जोर बढ़ता है। इसके परिणामस्वरूप, लोगों के पास अधिक विचारशीलता और अद्वितीयता को समझने की क्षमता होती है और वे एक विषय पर बातचीत करने के लिए खुद को सक्षम पाते हैं।


विवाद आपत्तिजनक हो सकता है, लेकिन यह भी एक मौका है कि हम अपने विचारों को बढ़ावा देने के लिए सुनें, सीखें और विश्वास करें। विवादों से हमेशा कुछ नया सीखा जा सकता है और यही हमारे समाज को आगे बढ़ाने और सुधार करने की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।

Thursday, December 15, 2016

नये नोट और अफवाह

नये नोट और अफवाह

नये नोट और अफवाह

नोट बंदी के बाद नये नोट बाज़ार में आये और साथ में कोई सारी अफवाह भी उनके साथ आयी । जो सिर्फ लोगो को परेशान और बेवकूफ बनने के लिए फैलाई गई थी । भारत में जब भी कोई बदलाव होता है ,तो उससे जुड़ी अफवाह अवश्य फैलती है । जिस समय नोट बंदी हुई थी उसके दूसरे दिन ही एक अफवाह यह आयी की नमक महंगा होने वाला है, लोगो ने बिना सच्चाई जाने ही इस पर यकीन कर लिया और फिर क्या सब टूट पड़े दुकानों पर, बिना सच्चाई जाने ऐसा करना बेवकूफी है। तो आज की पोस्ट नये नोटो पर फैली अफवाह पर है , जिसमे नोट नोट से जुड़ी अफवाह की सचाई बताई जाएगी ।

नेनो टेक्नोलोजी GPS चिप :-

नोट बंदी के बाद सबसे पहले फैली ये अफवाह की नये 2000 के नोट में नेनो टेक्नोलोजी से बनी जीपीएस चिप लगी होगी जो नोट की loction treck करेगी । जिससे यह पता चलेगा की नोट अभी किस जगह पर है। ये तकनीक इसलिए बनाई गई थी ताकि नोट की जमाखोरी को रोका जा सके। पर ये सिर्फ अफवाह थी।  2000 के नोट में कही पर भी किसी भी प्रकार की नेनो जीपीएस चिप नही लगी है, ये बात भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा, और लोगो को नसीहत दी की ऐसी किसी भी अफवाह पर ध्यान न दे.



असली नोट की पहचान एक सॉफ्टवेयर से :-
नये नोट को लेकर अफवाह का बाजार गर्म रहा , नोट पर वीडियो प्ले हो तो समझो नोट असली है, इस तरह के 
अफवाह फ़ैलाने वालों पर रखी जा रही है । नजर, और उसे सजा भी भी हो सकती है । भारत में 500 और 1000 
के पुराने नोट बंद होने के बाद 500 और 1000 के नये नोट आ चुके है लेकिन कुछ लोग अभी तक इन्हें देख भी 
नही पाए है,
इस बात का फायदा उठाते हुए कुछ शातिर अपराधी लोगों ने आम जनता को ठगना शुरू कर दिया है ऐसे लोग 
स्कैन और प्रिंट करते तैयार किये गए नकली नोटों को चलाने की कोशिश कर रहे है, इसी के साथ ही कई और 
भी अफवाह फ़ैल रही है। 
एक एप  modi keynote के बारे में है, अफवाहों में कहा जा रहा है, की इस mobile एप के जरिययह जांचकी जा सकती है की 500 और 1000 के नये नोट असली है या नकली, जबकि ये एप सिर्फ मनोरंजन के लिए है,
लेकिन बहुत से लोग इस एप को यह कहकर प्रचारित करने में लगे हुए है कि इसके जरिये नोट की पहचान की जा सकती है,  और बाजार में यह अफवाह वायरल हो चुकी है , 
इस एप को ऐसे डेवलप किया गया है, की स्कैन होने पर जैसे ही नये नोट के कलर और डिजाईन नजर आते है तो एप पर modi की विडियो प्ले होने लगती है,  मगर ये एप नोट को असली या नकली बताने में सक्षम  नही है, सरकार द्वारा गुजारिश है की इस एप को करंसी चेक करने के लिए इस्तेमाल न करें,

नोट का आग में न जलना :-

नये नोट बारे में बहुत से लोग ये अफवाह  भी फैला रहे है की नया नोट आग में नही जलता, पर ये सिर्फ अफवाह मात्र में ऐसा कोई कागज नही जो आग में न जले , तो ऐसी अफवाह से दूर रहे किसी के झाशे में  आ कर अपने कीमती नोट को न जलाये ,
आप इस विडियो में देख सकते है की 2000 का नया नोट आग में जल सकते है, विडियो देखने के लिए यहाँ click करे ,click hare


रेडियो एक्टिव स्याही :-

इन दिनों सोशल मीडिया पर नोटों में रेडियोएक्टिव स्याही के इस्तेमाल होने की बात कही जा रही है।
कई सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर और व्हाट्सएप पर इस तरह के मैसेज फॉरवर्ड किए जा रहे हैं जिनमें नोटों के पकड़े जाने की पीछे की वजह को उनमें इस्तेमाल स्याही को बताया जा रहा है। इन मैसेजेस में बाकायदा तर्क दिया गया है कि नोटों में प्रिंटिंग के समय फॉस्फोरस के रेडियोएक्टिव आइसोटोप का इस्तेमाल किया जा रहा है। जिसमें 15 प्रोटॉन और 17 न्यूट्रॉन होते हैं। यह रेडियोएक्टिव वार्निंग टेप की तरह प्रयोग होता है। इस तरह एक ही जगह पर अगर बहुत अधिक मात्रा में नोट होते हैं तो रेडियोएक्टिव मेटर इंडीकेटर से इसका पता चल जाता है। इसी से ऐसे लोग जांच समितियों के रडार की पकड़ में आ रहे हैं। 
गौरतलब है कि रेडियोएक्टिव पदार्थ से अल्फा, बीटा और गामा कण निकलते हैं, जो शरीर के लिए बेहद हानिकारक होते हैं इस वजह से त्वचा का कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियां होने का खतरा रहता है। लेकिन इन मैसेज में साफ तौर पर कहा गया है कि यह ऐसा रेडियोएक्टिव पदार्थ है जिससे शरीर कोई नुकसान नहीं होता है। हालांकि रेडियो एक्टिव तत्व की एक विशेषता होती है कि वह एक निश्चित समय में अपनी मूल मात्रा का आधा रह जाता है इसे अर्धआयु  (T1/2) कहते हैं। हम एक बार फिर आपको बता देना चाहते हैं कि ये पूरी तरह से अफवाह है। ये हमारी जांच एजेंसियों की सतर्कता का नतीजा है जो इतनी बड़ी मात्रा में नोटों की तस्करी को रोका जा रहा है।




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